खेलकूद एवं स्वास्थ्य के प्रति बच्चों की बढ़ती अरुचि एवं उसका जीवन पर प्रभाव

वर्तमान में हमारी जीवन शैली बदल गयी है,ये बदलाव हमें गंभीर रोगों की तरफ धकेल रहा है | इससे कोई भी अछूता नहीं है – चाहे बच्चें हो,युवा हो या बुजुर्ग सभी समय से पूर्व काल के ग्रास बनते जा रहे हैं | आज की नई पीढ़ी खेलकूद के प्रति उदासीन हैं,उनका बचपन घर की चहारदीवारी में सिसकियाँ ले रहा है |

खेलने के नाम पर वीडियो गेम्स,मोबाइल तथा विद्युतीकृत खिलौनों तक ही समाप्त हो गया हैं |

“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है |” अगर बच्चें स्वस्थ ही न होंगे तो उनके मस्तिष्क का समुचित विकास कैसे संभव है ? आज घर विलासिता की सामग्रियों से अटे पड़ें हैं,बच्चें वातानुकूलित घरों में रहते हैं यहाँ तक शिक्षा भी ऐसे विद्यालयों में प्राप्त करते हैं | ऐसे बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बहुत कम हो जाती है | ये बच्चें जब प्राकृतिक हवा में साँस लेते तब बाहर के वातावरण के अनुकूल नहीं हो पाते है और कई बीमारियाँ लग जाती है |

खेलने से बच्चों के शरीर का समुचित विकास होगा,उनकी मांस-पेशियाँ मजबूत होगी | आज बच्चों में मोटापा बढ़ता ही जा रहा है जो सब रोगों की जड़ है | आज के बच्चें पैदल तो घूमना शायद भूल ही चुके है घर से बाहर निकलते माँ-बाप कार या दुपहिया वाहन लेकर खड़े रहते हैं | आज की पीढ़ी दो कदम ही चलने पर हांफने लगती है,शारीरिक श्रम तो बहुत दूर की बात है |

‘पहला सुख नीरोगी काया |’ कहावत से सभी वाकिफ़ हैं  लेकिन वर्तमान जीवन पद्धति ने हमारी काया को खोखला कर दिया है | आज के बच्चों पर पढाई का भी इतना दबाव रहता है कि वे खेलने के बारे में सोच भी नहीं सकते | आधुनिक शिक्षा प्रणाली व अंकों की होड़ में नई कलियाँ समय से पूर्व ही कुम्हला जाने लगी हैं | अगर नव-पीढ़ी स्वस्थ नहीं रहेगी तो प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बहुत पिछड़ जाएगी | कम उम्र में ही उच्च रक्तदाब एवं मधुमेह के रोगी दिन-प्रतिदिन  बढ़ते ही जा रहे हैं | इन सबकी जड़ बच्चों की दिनचर्या ही है | खेलकूद सर्वांगीण विकास के लिए जरुरी है | अत: ‘खेलोगे कूदोगे तो बनोगे नबाब,घर में रहोगे तो होंगे ख़राब |’

 

कुन्दन  

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